महिला/ स्त्री सशक्तिकरण – देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व: मनुष्य, समाज, सामाजिकता, सामाजिक उत्थान, ज्वलंत मुद्दों पर आधारित समस्या व समाधान…!!! स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता…!!!

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पेपर सूक्षम प्रारूप एवम रुपरेखा

यह लेख लगभग “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व: मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व” सामाजिक – नेतृत्व व सामाजिक – आविष्कारों एवम वास्तविक ज्वलंत मुद्दों पर आधारित समस्या व समाधान की बात करता है। देश, समाज व मनुष्य…!!!

नेतृत्व…!!!

सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व…!!!

- जाति

- स्त्री

- शाब्दिक/ कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति

- स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता

- स्वतः स्फूर्त सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व की आवश्यकता देश, समाज व मनुष्य…!!!

मनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज व देश होगा ही होगा। मनुष्य परिवार, समाज व देश से बड़ा है, क्योंकि वह निर्माता है। देश व समाज की सत्ता, जीवन – मूल्य, नियम – कानून, रीति – रिवाज, खानपान, रहन – सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही निर्मित, निर्धारित व परिवर्तित करता है। यही सहज सामाजिक तथ्य है; शेष राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व के लिए तोड़मरोड़ कर निहित – स्वार्थों के लिए थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं। 1*करेस्पोंडिनग ऑथर: डॉ. हरीश कुमार गुप्ता एंड harishgupta1008@yahoo.com; h.g@rediffmail.com; 09329213257; मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिए देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव – वस्तु न होकर, जीवंत – वास्तविकता होता है, जिसका निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़, गतिशील, चारित्रिक व जीवंत – रचनात्मक संबंध होता है। देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील – जीवंत – चारित्रिक रचना है। इसलिए जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है। परिवार, देश व समाज का निर्माण व विकास करना मनुष्य की जिम्मेदारी है। जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की पुस्तकों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा। यही वास्तविक व व्यापक परिवर्तन होगा। मानव निर्मित सत्ता तंत्रों को चलाने वाले वैयक्तिक – समूहों, दलगत – समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है। पहल आर्थिक आजादी की…!!!

राजनीति: आजादी के 100वें साल तक हम दुनिया की पहली आर्थिक ताकत होंगे चंद्रबाबू नायडू…!!!

चेन्नई, 28th मार्च, वर्ष 2025: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने शुक्रवार को चेन्नई स्थित आईआईटी, मद्रास में “अखिल भारतीय शोध विद्वान शिखर सम्मेलन वर्ष 2025” को संबोधित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर हम सब कड़ी मेहनत करें तो आजादी के 100वें साल तक दुनिया की पहली आर्थिक ताकत बन जाएंगे। चंद्रबाबू नायडू ने कहा, “मुझे आप सभी पर गर्व है, जिसमें छात्र और संकाय शामिल हैं। आप सभी भारत को देख रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भविष्य हमारा है, कल हमारा है। आईआईटी, मद्रास एनआईआरएफ रैंकिंग में नंबर वन है। विश्व रैंकिंग में 227वें स्थान पर है। अंततः यह निकट भविष्य में 100 के अंदर आ जाएगा।” वे अपने पास मौजूद हर नए विचार पर काम कर रहे हैं। आईआईटी, मद्रास ऑफ कैंपस कोर्स को भी प्रायोजित कर रहा है। यह एक ऐसी जगह है जहां हम उद्यमिता के बारे में बात कर रहे हैं। आईआईटी मद्रास में लगभग 30 प्रतिशत छात्र आंध्र प्रदेश से हैं। उन्होंने कहा कि आज हम कोई भी उद्योग शुरू कर सकते हैं। यही सुधारों की खूबसूरती है। लगभग वर्ष 1962 – 1990 के बीच आईआईटी से लाखों स्नातक निकले। यहां के छात्रों के पास रूस और चीन जैसे व्यापक विचार हैं। हमने वर्ष 1991 में आर्थिक सुधारों को विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि मजबूरी में शुरू किया था। मैंने कभी – कभी मजाक में कहा है, लेकिन यह एक वास्तविकता भी है कि अंग्रेजों ने सब कुछ ले लिया, लेकिन अंग्रेजी को हमारे पास छोड़ दिया। यह हमारे लिए बहुत बड़ा तोहफा है। परंपरागत रूप से हम गणित और विज्ञान में मजबूत हैं। हिंदी और अंग्रेजी भाषा के साथ – साथ भी हम और आगे बढ़े यह हमारी कामना और इच्छा है। नोटबंदी का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि नोटबंदी के समय मोदी जी ने उनसे एक रिपोर्ट देने को कहा था। उन्होंने कहा, “मैंने यूपीआई और आधार के लिए वह रिपोर्ट दे दी है। आज यूपीआई एक हकीकत बन गया है। डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल में आगे बढ़ने पर हमें गर्व है।” चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि पिछले 10 साल में देश की जीडीपी विकास दर दुनिया में सबसे ज्यादा रही है। साल 2026 तक हम चौथे स्थान पर आ जाएंगे और वर्ष 2028 तक हम तीसरे स्थान पर पहुंच जाएंगे। अगर हम सब मिलकर मेहनत करें तो आजादी के 100वें साल तक हम दुनिया की पहली आर्थिक ताकत बन जाएंगे। अगले 25 साल तक हम युवा आबादी का लाभ उठाएंगे। उन्होंने कहा, “अगर आप दुनिया के किसी भी पॉश इलाके में जाते हैं, तो तमिल या तेलुगु में चिल्ला सकते हैं, आपको जवाब मिलेगा। भारतीय दुनिया के किसी भी माहौल के अनुरूप खुद को ढाल सकते हैं। साल 2047 तक भारतीय समुदाय वैश्विक स्तर पर नंबर वन होगा। आज 65 फीसदी भारतीय जनरेटिंग एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह हमारे प्रौद्योगिकी उपयोग का एक उदाहरण है। लगभग 80 साल के बाद भी भारतीय अथक परिश्रम कर रहे हैं। यह हमारे लिए एक फायदा है। पूरी दुनिया में अभी कुल चार करोड़ लोग पलायन कर चुके हैं। अगर हम निकट भविष्य में 20 से 30 करोड़ पलायन कर जाते हैं तो हम कॉर्पोरेट सरकारों और सार्वजनिक सरकारों में अग्रणी बन जाएंगे। मैं भारतीयों को दुनिया भर में नंबर 1 के रूप में देखना चाहता हूं।” नेतृत्व…!!!

राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भी सामाजिक – अवतार नहीं होता। जो सामाजिक – अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक – अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक – अवतार मनुष्य निर्मित उन्हीं तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जाने का साहस व दृष्टि हो ही नहीं सकती है। इसीलिए तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक – अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते हैं। ऐसे सामाजिक – अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं। मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाते हुए, निरंतर दबाए रहते हुए ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिए मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, न ही व्यापक – समाधान की दृष्टि रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक – अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं। भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर – मानव योनि जीव भी सामाजिक – अवतारों के रूप में प्रतिष्ठापित किए गए हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली। विश्व में अन – आयुधिक सहज वैज्ञानिक – आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य – निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलते हुए ही अस्तित्व में आए हैं। सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व…!!!

सामाजिक – परिवर्तन व निर्माण कर पाने में सक्षम नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण मौलिकता, गुणवत्ता, दूरदर्शिता, स्वतः स्फूर्ति के मिथकों के प्रयोजन बिना ही होता है। भारत जैसे बड़े देश व समाज में स्वतः स्फूर्त व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण न हो पाने के प्रमुख कारण जाति – व्यवस्था, ईश्वरीय अवतारों व इन अवतारों का धरती पर ईश्वरीय व्यवस्था के प्रयोजन के कारण अवतरित होने की अवधारणाएं, साहित्यिक काव्यों/ ग्रंथों को संपूर्ण ज्ञान व ईश्वरीय मानने की अवधारणा, पोथियाँ, पौराणिक कथाएं व सामंतवादी मानसिकता आदि रहे हैं।

- जाति सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग की अवधारणा, जन्मजात जाति – व्यवस्था, धर्म का क्षय होने पर धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के द्वारा अवतार लेने की अवधारणा, मंत्रों व ईश्वरीय नाम के जाप द्वारा सुविधा/ प्रतिष्ठा/ समृद्धि आदि का मनचाहा वरदान या सिद्धि प्राप्त कर पाने की अवधारणा, सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सत्य में देवतुल्य था; आदि आदि…!!! जैसी विभिन्न अवैज्ञानिक अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व की भ्रूण – संभावना को ही नष्ट कर दिया और भ्रूण – संभावना का यह नष्टीकरण परंपरा में हजारों वर्षों तक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मानसिकता आदि के विभिन्न स्तरों में गहरे अनुकूलन को प्रायोजित व स्थापित करने के साथ होता रहा। भारत की सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी का सबसे प्रमुख कारण यही रहा कि क्षत्रिय वर्ग को दरबारी भाटों, चाटुकारों व मिथक – साहित्य विशेषज्ञों ने झूठी कहानियाँ व मिथक गढ़ कर ही ईश्वरत्व रूप में जन्मजात पुरुषार्थी, निर्भय, रक्षक, शासक, राजनैतिक दूरदर्शिता व दृष्टिकोण आदि से संपन्न प्रायोजित कर दिया। गढ़े हुए मिथकों की पुष्टि करने के लिए ब्राह्मण वर्ग ने अनेकों पौराणिक कथाएं परंपरा में सत्य कथाओं के रूप में प्रायोजित करके, राजनैतिक सत्ता से अपना संबंध स्थापित करने के लिए क्षत्रिय वर्ग के द्वारा राजनैतिक सत्ता के भोग को ईश्वरीय प्रावधान के दायित्व का निर्वहण प्रायोजित कर दिया। भारत में “सामाजिक नेतृत्व” लोगों में “आभामंडल – सत्ता” स्थापित करने का और विभिन्न सत्ताओं द्वारा प्रायोजित होने का ही रहा है, इसीलिये “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व” और “सत्ताओं” का आपस में बहुत गहरा व विश्वसनीय रिश्ता रहा है। यही कारण रहा कि भारत में शताब्दियों के बाद आज तक भी भारतीय समाज में स्वत: स्फूर्त “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व” आकार नहीं ले पाया। चूंकि समाज में जाति – व्यवस्था के कारण स्वत: स्फूर्त, वास्तविक – गुणवान् व मौलिक नेतृत्व विकसित होने की परंपरा नहीं बनने दी गई इसीलिए समाज के लोग धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसरवादी आदि होते चले गए, क्योंकि जाति – व्यवस्था के निरंतर स्थापना – प्रयोजन के लिए यही आधारभूत मूल्य व तत्व होते हैं। जाति – व्यवस्था के कारण भारतीय समाज कभी देश व समाज के प्रति ईमानदार व प्रतिबद्ध नहीं हो पाया केवल व्यक्तिगत लिप्साओं, स्वार्थों, भोगों, विलासिताओं, बाजार के उपभोक्तवाद पर आधारित उपभोक्ता बने रहने की व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा आदि स्वार्थ – केंद्रित महात्वाकांक्षाओं के लिए प्रयत्न करना ही जीवन के मायने मान लिया गया। भारतीय समाज में सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व की वास्तविकता समझने के लिए एक कहानी को ही समझना पर्याप्त है। महान् गुरू के रूप में स्थापित द्रोणाचार्य ने अद्वितीय प्रतिभाशाली किशोर एकलव्य के दाहिने हाथ का अगूँठा केवल इसलिए कटवा दिया क्योंकि एकलव्य आदिवासी था और द्रोणाचार्य अपने शिष्य, जो एक बहुत बड़े राज्य का राजकुमार था, को महान् धनुर्धारी के रूप में प्रायोजित करना चाहते थे। यह कहानी उस समाज की है जो गुरू – शिष्य परंपरा की संस्कृति की बात करता है और जिस समाज ने द्रोणाचार्य को महानतम गुरू का स्थान दे रखा है। द्रोणाचार्य बहुत कुशल धनुर्धारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने सामाजिक गुरू होने के मूल्यों का ही पतन किया और भारतीय समाज को एकलव्य जैसे अद्वितीय धनुर्धारी से वंचित कर दिया। भारतीय समाज ने विभिन्न स्तरों व क्षेत्रों में अगणित एकलव्यों के अगूँठे काटे हैं। काश…!!! यदि इन एकलव्यों के अगूँठे नहीं काटे गए होते, काश..!!! विभिन्न स्तरों पर प्रायोजित लोग स्थापित नहीं किए गए होते तो आज भारत को प्राचीन – काल की गाथाएं गाकर खुद को महान् सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, न ही भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहता और न ही आज पिछलग्गू होता।

- स्त्री समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शूद्र – वर्ण में रखा गया, जिसको जीवन के मौलिक अधिकार पशुओं जैसे तक नहीं थे। शूद्र – वर्ण के अतिरिक्त जो वर्ण थे, उन वर्णों की भी लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् स्त्री को पशु और वस्तु की श्रेणी में रख दिया गया। इस प्रकार समाज का पाँच में से चार जैसा बहुत बड़ा हिस्सा परंपरा में अपनी मौलिकता की भ्रूण – हत्या व अघोषित दासता का बर्बर – शोषण ही झेलता रहा। बचा – खुचा एक – पाँचवा हिस्सा परंपरागत मूर्खतापूर्ण सीमा में ही तथाकथित सामाजिक – नेतृत्व देता रहा। प्रायोजित सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व ने स्त्री, जो जीवंत व चेतनशील मनुष्य है, उसको वस्तु के रूप में प्रायोजित कर दिया। जो संस्कृति स्त्री को देवी मानने का दावा करती है उसी के समाज में स्त्री को प्रेम करने से वंचित कर दिया गया, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिए। यहाँ तक कि स्त्री को अपना पति तक चुनने का अधिकार नहीं रहा। जिस स्त्री को देवी कहा गया उसी को पर्दे में धकेल दिया गया, शिक्षा से वंचित रखा गया व संपत्ति में अधिकार नहीं दिए गए ताकि वह सदैव पुरुष की दासी बनी रहे। स्थिति की भयावहता की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि आज भी प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियों की हत्या माता के गर्भ में ही खुद उनके ही माता – पिता द्वारा कर दी जाती है। आज भी हजारों स्त्रियों की हत्या उनके ही माता – पिता व परिवार के द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है, क्योंकि स्त्री अपने माता – पिता व परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से प्रेम – विवाह करना चाहती है। स्त्री… जिसे देवी कहा गया वही स्त्री प्रेम करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पर्दा न करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पुरुष की उपस्थिति में खुलकर खिलखिलाकर हँस ले तो वह चरित्रहीन व कुलटा। स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया लेकिन स्त्री के द्वारा पुरुष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व देखने को ही उसका देवी होना प्रायोजित कर दिया गया। स्त्री के द्वारा परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष और पुरुष के परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष, फिर भी स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी। स्त्री के गृहस्थ कार्यों को श्रम की श्रेणी में नहीं रखा गया जबकि वह संतान की जननी व पालन पोषण करने वाली भी है। स्त्री की कर्मशीलता को पुरुष के कारण होना मान लिया गया परिणामस्वरूप स्त्री के द्वारा सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व की संभावनाओं के भ्रूण की भी संभावना की स्थिति समाप्त हो गई। यही कारण हैं कि बलात्कार होने पर या स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होने पर, समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता रहा है। चूंकि स्त्री को मनुष्य माना ही नहीं गया, इसीलिए स्त्री के पहनावे या बोलचाल या व्यवहार के तरीके को बलात्कार का कारण ठहराया जाता है। इसको कुछ इस रूप में देखा जाए जैसे कोई वस्तु यदि रात में घर के बाहर पड़ी है तो कोई भी उसे चुराकर ले जा सकता है, उसी प्रकार स्त्री यदि रात में घर से बाहर है तो कोई भी उसके साथ बलात्कार कर सकता है। कोई महंगी वस्तु यदि छिपाकर न रखी जाए तो उस पर चोरों की नजर पड़ी रहेगी और वे चुराने का प्रयास करेंगे, वैसे ही स्त्री यदि छोटे कपड़े पहने है तो पुरुष स्त्री का स्त्रीत्व चुराएगा। एक समाज जो स्त्री को देवी मानता है, वही समाज स्त्री के बारे में सब कुछ बहुत ही अधिक वीभत्सपूर्ण घिनौनेपन और असंवेदनशीलता से तय करता है, जैसे स्त्री निर्जीव – वस्तु हो।

- शाब्दिक/ कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति सामाजिक – नेतृत्व को परंपरा में विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा प्रायोजित व स्थापित करते रहने के कारण भारतीय समाज अपने लिए ही क्रूरता की हद तक असंवेदनशील समाज के रूप में दृढ़ होता गया। बचपन से ही अपनी कमजोरियों को देखने, उनके कारणों को समझने और उनको दूर करने की चेष्टा करना सिखाए जाने के बजाय ढोंगो व सतही प्रायोजनो से दूसरों को निर्दयता व असंवेदनशीलता पूर्वक अपने से खराब साबित करके खुद को अच्छा एवम् कर्म व पुरुषार्थ साबित करने की तकनीक सिखाई जाती है। यह मानसिकता ही बचपन से ही जाने – अनजाने चाहे – अनचाहे समाज में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता, क्रूरता व सामंतवादिता के बीज को पोषित करती रहती है। हम यदि खुद के जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारा अपना पूरा का पूरा जीवन ही झूठ और दिखावे का पुलिंदा है। हमें बचपन से ही दिखावे की पुनरुक्ति के लिए इस तरह का अभ्यास करवाया जाता है कि हम खुद अपने आपको ही भूल जाते हैं और अपने ढोंग, खोखलेपन, निर्दयता, असंवेदनशीलता, अवैज्ञानिक – तर्कशीलता व अतथ्यात्मकता आदि को ही अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकता और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि व उद्देश्य मानने लगते हैं। हमें पता ही नहीं चलता और हम सड़ने लगते हैं। जब हमें अपने सड़ने की बदबू आती है, हम बदबू का कारण बाहर खोजते हैं। हम बदबू का कारण बाहर इसलिए नहीं खोजते क्योंकि हमें बदबू का कारण वास्तव में खोजना होता है। ढोंगो और प्रायोजन के आदी हम वास्तव में अपने से अधिक बदबूदार को खोजना चाहते हैं ताकि खुद को उसकी तुलना में खुशबूदार साबित करके खुद को बेहतर प्रायोजित कर खुद को महान् मान लें। यही कारण है कि हम दिन – प्रतिदिन और अधिक सड़ते जाते हैं लेकिन फिर भी दूसरों की तुलना में खुद को खुशबूदार मानते हैं।

- स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता यह हमारी स्वयं के प्रति घोर निर्दयता व असंवेदनशीलता ही है कि हम वास्तविक खुशबू में जीने के प्रयास करने के बजाय अपनी सड़ाँध व बदबू को ही खुशबू के रूप में प्रायोजित करने में अपनी ऊर्जाएं लगाते हैं। हम पूरा जीवन नशे व बेहोशी में जीते हैं, और बेहोशी में जीवन जीने को हम जीवन की व्यावहारिकता कहते व साबित करते हैं; जबकि वास्तव में यह हमारा अपने खुद के प्रति ही और अधिक असंवेदनशील होना ही है। हम स्वयं को विकसित करने के लिये, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए कर्म, प्रयास या चेष्टा नहीं करना चाहते हैं। स्व – निर्माण की प्रसव पीड़ा नहीं झेलना चाहते हैं। इसीलिए हम अपने जीवन के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए व देश के लिए ऐसे सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व प्रायोजित करते हैं; जो हमारे जैसे ही हों। सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व छोड़िए हमने तो अपने ईश्वर भी अपने ही जैसे बना रखे हैं। सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण वास्तविक कर्म से हुआ करता है। ढोंग व सतहीपन से युक्त विभिन्न स्तरों पर अनुकूलताओं के प्रयोजन से नहीं। भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व समाज की बेहतरी के लिए किए गए पुरुषार्थ, कर्म, सक्रिय चिंतन, जीवंत कर्म – अनुभव आदि मूल्यों के आधार पर नहीं स्वीकृत किए गए हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विकास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि में बहुत ही पीछे रह गया। शताब्दियों तक राजनैतिक गुलाम रहा और आज भी मानसिक गुलाम है।

- स्वतः स्फूर्त सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व की आवश्यकता भारत सामाजिक रूप से बहुत अधिक विद्रूपताओं और विविधताओं का देश है। इसलिए भारत का राष्ट्रीय सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व वही कर सकता है जो भारत को भारत की विद्रूपता और विविधताओं के साथ स्वीकारे और फिर सबको साथ लेकर चलते हुए बढ़े। सामाजिक नेतृत्व का सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरा व स्पष्ट संबंध होता है, बिना सामाजिक सरोकारों व सामाजिक संबंधों को समझे कोई भी सामाजिक नेतृत्व नहीं हो सकता है। भारतीय समाज को शताब्दियों के अनुकूलन से बाहर आकर अपनी वास्तविक स्थिति, गति को स्वीकारते हुए विभिन्न स्तरों पर वास्तविक परिवर्तकों को “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है। शाब्दिक व दार्शनिक तर्कशीलता के मानदंडों में अद्वितीय व विलक्षण संस्कृति वाला समाज व्यावहारिक धरातल की वास्तविकता में बहुत ही अधिक अमानवीयता व खोखलेपन को ही पोषित करता व जीता रहा। दर्शन को व्यवहारिक – जीवंतता के स्थान पर केवल शाब्दिक तर्कशीलता तक ही सीमित किया जाता रहा। वास्तव में भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऋणात्मकताएं ढोंग, अमानवीयता व असंवेदनशीलता हैं और ये तत्व ही मूलभूत कारण हैं कि भारतीय समाज बहुत ही वीभत्सता के स्तर तक आंतरिक रूप से सड़ा हुआ है। फिर भी समाज के लोग जो खुद अपने ही जीवन में खोखले होते हैं, रटे – रटाए दर्शन की कृत्रिम शाब्दिक – तार्किकता से अपने को व अपनी संस्कृति को जबरन महान् सिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गीता को महान् बताने वाला समाज, कर्म को ही उपेक्षित रखता आया है। यदि भारत को वास्तव में आगे बढ़ना है तो पूरी कठोरता व इच्छाशक्ति के साथ बिना लाग – लपेट के सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व के प्रायोजनों की परंपरा व अनुकूलता से दृढ़तापूर्वक बाहर निकलकर वास्तविक स्वतः स्फूर्त सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व के प्रस्फुटीकरण का बीजारोपण करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं। यह लेख लगभग “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व: मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व” सामाजिक – नेतृत्व व सामाजिक – आविष्कारों की बात करता है। As an Indian citizen and permanent resident of India and a scholar, an author, a social – policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and as a journalist; Study has been exploring, understanding and implementing the ideas of social – economy, participatory local governance, education, citizen – media, ground – journalism, rural – journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs and rehabilitation, village revival and other matters of concerned etc.

For Ground Report India editions, organising national or semi – national tours for exploring ground realities covering 5,000 to 15,000 Kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

However the subject matter written in this study area/ chapter “सामाजिक – उत्थान – नेतृत्व: मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” is customarily based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks and efforts and conditioning of thoughts and mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What…!!!” “Why…!!!” “How…!!!” practically for the development and social solution or resolution in India.

रीबी तो कम हुई है लेकिन सबसे बड़ी चिंता भी बढ़ी…!!!

आज़ाद भारत के 75 साल पूरे होने पर जो भी विश्लेषण देखने को मिल रहा है उनमें से अधिकांश में पिछले तीन दशकों की बात हो रही है. ज़ोर इस बात पर है कि कैसे इस अवधि के दौरान भारत एक बेमिसाल देश बन गया है.

कई लोग याद दिला रहे हैं कि कैसे लैंडलाइन फोन कनेक्शन के लिए अपने इलाके के सांसद के चक्कर लगाने होते थे, गैस कनेक्शन के लिए महीनों लंबा इंतज़ार करना होता था और अपने परिजनों से बात करने के लिए सार्वजनिक फोन बूथ के बाहर लंबी कतार में घंटों इंतज़ार करना पड़ता था.

लगभग वर्ष 1990 के दशक में और उसके बाद पैदा हुए लोग उपरोक्त बातों से परिचित न होंगे लेकिन पुरानी पीढ़ियों के लिए ये जीता जागता सच रहा है.

स्कूटर ख़रीदने के लिए भी सालों इंतज़ार करना होता था. वहां से स्थितियां काफ़ी बदल गई हैं. प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल, उत्पादों की निरंतर आपूर्ति और लाइसेंस के तौर तरीक़ों में संशोधन से यह बदलाव आया है.

सर्विस सेक्टर और रोज़मर्रा के कामों में एक हद तक व्यक्तिगत आग्रहों या फ़ैसलों को खत्म किया गया था. इससे मध्य वर्ग की रोज़मर्रा की ज़िंदगी काफ़ी आसान हो गई है.

लगभग वर्ष 1990 के दशक में आर्थिक सुधार ज़ोरशोर से लागू कर दिए गए और तब से जो रास्ता बना है उसमें कई बदलाव आ चुके हैं जो आज भी स्पष्ट तौर पर नज़र आ रहे हैं.

आर्थिक सुधारों से निकले महत्वपूर्ण बदलाव ये थेः प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में बढ़ोतरी, आपूर्ति व्यवस्था की स्थिति में सुधार और लाइसेंस राज की समाप्ति.

लेकिन इन बदलावों के अलावा और भी ऐसे बुनियादी मुद्दे थे जिन पर चर्चा किए जाने की ज़रूरत है और जो ज़्यादा प्रखर तौर पर सर्विस सेक्टर में नज़र आने लगे थे. इसे समझने के लिए दो मुख्य प्रक्रियाओं को देखना होगा. एक तरफ़ ग़रीबी कम हो रही है तो दूसरी तरफ़ असमानता बढ़ रही है. इस लिहाज से देखें तो 75 साल में दो अहम बदलाव हुए – ग़रीबी में कमी और असमानता बढ़ गई.

ग़रीबी में कमी लगभग वर्ष 1994 और 2011 के बीच भारत में कहीं ज़्यादा तेज़ गति से ग़रीबी कम हुई. इस अवधि के दौरान ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या 45 फ़ीसद से गिरकर 21.9 फ़ीसद पर आ गयी.

क़रीब 13 करोड़ लोगों को घोर ग़रीबी से बाहर निकाल लिया गया था. वर्ष 2011 के बाद के आंकड़े आधिकारिक तौर पर जारी नहीं हुए हैं. हालांकि सर्वे हुए हैं लेकिन उसके आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं.

विश्व बैंक के मुताबिक वर्ष 2019 के अंत तक ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले आबादी 10.2 फीसदी पर आ गई थी. शहरी भारत के मुक़ाबले ग्रामीण भारत की स्थिति ज़्यादा बेहतर थी.

ये ध्यान देने वाली बात है कि अत्यंत ग़रीबी में जीवन यापन करने वालों की संख्या कम करने में 75 साल लगे थे और आर्थिक सुधारों के 30 सालों की इसमें एक अहम भूमिका थी. क़रीब आधी से ज़्यादा आबादी – करीब 45 फीसदी – तीन दशक पहले ग़रीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रही थी. आज वो संख्या 10 फ़ीसद है. ये एक असाधारण बदलाव है.

ये साफ़ है कि इन तीन दशकों में गरीबी हटाओं के नारे को जीवंत बनाने के लिए ज़बर्दस्त तेज़ी दिखाई गई है.

असमानताओं में वृद्धि इसी दौरान, इन तीन दशकों में लागू आर्थिक सुधारों से असमानताएं भी बढ़ी है. अरबपतियों की संपत्ति आसमान छूने लगी है. राष्ट्रीय संपदा में सबसे निचले पायदान के लोगों का हिस्सा कम होता जा रहा है.

लगभग वर्ष 1990 के दशक में भारत से दुनिया के अरबपतियों की फोर्ब्स की सूची में कोई शामिल नहीं था. वर्ष 2000 में उस सूची में 09 भारतीय थे. वर्ष 2017 में उनकी संख्या 119 हो गई. और वर्ष 2022 में फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में 166 भारतीयों के नाम हैं.

रूस के बाद सबसे ज़्यादा अरबपति भारत में हैं. वर्ष 2017 की ऑक्सफैम रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय संपदा का 77 फ़ीसद हिस्सा शीर्ष पर मौजूद 10 फ़ीसद लोगों तक सीमित है. सबसे अमीर शीर्ष के एक फ़ीसदी लोग 58 फ़ीसदी राष्ट्रीय संपत्ति पर स्वामित्व रखते हैं.

क्रमांक नंबर वर्ष टोटल नंबर्स

2000 : 09

2005 : 27

2010 : 69

2015 : 90

2017 : 119

2021 : 142

2022 : 166

2024 : 217

2025 : काल्पनिक और अनुमानित आंकड़े – 285

2026 : काल्पनिक और अनुमानित आंकड़े – 357 सरणी 1: भारत में अरबपतियों की संख्या (2000 – 2022).

(स्रोतः विश्व बैंक) लगभग वर्ष 1990 में अगर आय को देखें तो शीर्ष 10 फ़ीसदी के पास राष्ट्रीय आय का 34.4 फ़ीसद हिस्सा था और 50 फ़ीसद निम्न तबक़े की हिस्सेदारी राष्ट्रीय आय में महज़ 20.3 फ़ीसद थी. वर्ष 2018 में सबसे अमीर लोगों के लिए यह हिस्सेदारी बढ़कर 57.1 फ़ीसद हो गई जबकि ग़रीबों के लिए ये घटकर 13.1 फ़ीसदी रह गई.

उसके बाद भी, ऑक्सफेम रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड महामारी के दौरान भी अमीर लोगों की संपत्ति बढ़ती गई.

20 महीने में 23 लाख करोड़ लगभग वर्ष 2017 में सबसे अमीर 10 फ़ीसद लोगों के पास 77 फ़ीसद राष्ट्रीय संपत्ति थी. सबसे अमीर एक फ़ीसद लोगों के बाद राष्ट्रीय संपत्ति का 58 प्रतिशत हिस्सा मौजूद था.

ऑक्सफ़ैम के आंकड़ों के मुताबिक शीर्ष 100 अरबपतियों के पास वर्ष 2021 में 57.3 लाख करोड़ की संपत्ति आंकी गई थी. जबकि कोविड महामारी के दौरान (मार्च 2020 से नवंबर 2021 तक) भारत में अरबपतियों बढ़कर 23.14 लाख करोड़ हो गई थी.

भारत की कामयाबी या आर्थिक समृद्धि की कहानी को, ग़रीबी में कमी और असमानता में बढ़ोतरी के दो विपरीत तथ्यों के बीच देखना चाहिए.

वेतन में विशाल अंतर भारत उन देशों में से है जहां असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या ज़्यादा है. संगठित क्षेत्र में भी, वेतन का अंतर अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में अपर्याप्त वेतन, वेतन का अंतर, काम करने की परिस्थितियां और गैरसमावेशी बढ़ोत्तरी को भारत के लिए बड़ी चुनौती माना है. आईएलओ के अलावा, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने भी अपने एक शोध पत्र में इन मुद्दों की ओर रेखांकित किया है.

कुछ संगठनों में, सीईओ की पगार करोड़ों मे है, वहीं कर्मचारी 15 हज़ार रुपये प्रति महीने का वेतन पा रहे हैं. कुछ निजी कंपनियों में वेतन का अंतराल 1000 फ़ीसदी से ज़्यादा का है.

अगर बड़े देशों को देखें तो उनमें वेतन में अंतर के मामलों में भारत सूची में सबसे ऊपर है. इससे भी असमानता और बढ़ रही है.

इतिहास बताता है कि पूंजीवाद जितनी तरक्की करता है, विशेषज्ञता बढ़ती है. प्रौद्यगिकी के इस्तेमाल से कुशल और अकुशल श्रम में अंतर भी बढ़ जाता है. कुशल कर्मचारियों के लिए प्रीमियम भुगतान, वेतन के अंतर को बढ़ा देता है. ये याद रखना होगा कि उपरोक्त कारकों को पैमाना मानें भी तो भी वेतन का अंतर, विकसित और विकासशील देशों के मुकाबले, भारत में असामान्य ढंग से ज़्यादा है.

इसी तरह, संपत्ति वितरण के मापदंड के रूप में ज्ञात गिनी – गुणांक को रखें तो वर्ष 2011 में 35.7 था. वर्ष 2018 में ये बढ़कर 47.9 हो गया. पूरी दुनिया में, ख़ासतौर पर बड़े बाज़ारों के बीच, जब अत्यधिक असमानता की बात आती है तो भारत का नाम सूची में सबसे ऊपर आता है.

सीरियल नंबर वर्ष गिनी – गुणांक

1983 : 09

1993 : 27

2004 : 69

2011 : 90

2014 : 119

2018 : 142

2022 : 227

2024 : 318

2025 : काल्पनिक और अनुमानित आंकड़े – 405

2026 : काल्पनिक और अनुमानित आंकड़े – 547 सरणी 2: वर्ल्ड इनइक्वेलिटी डाटाबेस (डब्लूआईडी) आय की असमानता (वर्ष 1983 – 2018).

(स्रोतः विश्व बैंक) वर्ल्ड इनइक्वेलिटी डाटाबेस (डब्लूआईडी) के मुताबिक वर्ष 1995 से 2021 के दौरान सबसे अमीर एक फ़ीसद लोग और निम्न तबक़े के 50 फ़ीसद लोगों के बीच आमदनी का अंतर बढ़ा है.

नीचे दिए गए ग्राफ़िक्स में लगभग वर्ष 1995 से 2021 के दरम्यान अमीर 1% और निचले तबके के 50% के बीच आय के बढ़ते अंतर को दर्शाया गया है. लाल रेखा अमीर 1% और नीली रेखा निम्न तबके के 50% को दर्शाती है. ये ग्राफ़ बीते 20 वर्षों के दौरान इन दोनों वर्गों के बीच बढ़ती आय की असमानता को दर्शाता है.

ग्राफ़ 1: वर्ल्ड इनइक्वेलिटी डाटाबेस (डब्लूआईडी) अमीर और निम्न वर्गों की आय में बीच बढ़ता फासला (वर्ष 1995 – 2021).

(स्रोतः विश्व बैंक) जाने माने अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने भी भारत में बढ़ती असमानता की चर्चा की है. जब सबसे अमीर 10 फ़ीसद की आय को लेते हैं, तो भारत में असमानता वर्ष 2015 के रूस और अमेरिका के मुक़ाबले ज़्यादा दिखती है. ग़रीबी की तरह, असमानता भी एक सामाजिक बुराई है.

आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारत में संपत्ति बढ़ने के साथ साथ असमानताएं भी बढ़ी थीं और दोनों के बीच एक अकाट्य या अपरिहार्य रिश्ता है.

भारत में कई विश्लेषक अपनी सुविधा से आंकड़े चुनते हैं, अपना नज़रिया आगे बढ़ाकर पेश करते हैं और दूसरे मुद्दों को पीछे कर देते हैं. हालांकि कुछ ऐसे भी हैं जो ये सुनिश्चित करना नहीं भूलते कि वे मुद्दे बिल्कुल भी सुनाई न दें.

सरकार इस पर भी बात कर रही है लेकिन, तब भी पूरी तस्वीर उभर कर नहीं आती है. वास्तव में भारत सरकार चौथी पंचवर्षीय योजना से लेकर वर्ष 2020 – 2021 के आर्थिक सर्वे तक हर संभव स्थिति में बढ़ती असमानता की चर्चा करती आई है.

ग्राफ़िक्स 2: इनकम इनक्विअलिटी इन इंडिया, वर्ष 1922 – 2021.

(स्रोतः विश्व बैंक) लगभग वर्ष 1969 – 1974 की चौथी पंचवर्षीय योजना ने ऐलान किया था, “विकास का मुख्य मापदंड निजी स्तर पर लोगों को फ़ायदा पहुंचाना नहीं है. विकास की यात्रा समानता की ओर होनी चाहिए.” लगभग वर्ष 2020 – 2021 की आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट, “अरस्तू के इस कथन से शुरू होती है कि "ग़रीबी, क्रांति और अपराध की जननी है.” इस रिपोर्ट में, विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी के असमानता पर किए काम पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है.

हालांकि रिपोर्ट का नतीजा ये था कि संपत्ति में वृद्धि के साथ ग़रीबी में कमी आती है और इस अवस्था में बढ़ती हुई संपत्ति, असमानता से ज़्यादा महत्वपूर्ण है. इससे ये दिखता है कि भारत किस दिशा की ओर बढ़ रहा है.

प्रथम पंचवर्षीय योजना का मानना था कि तात्कालिक तौर पर पर्याप्त संपदा उपलब्ध नहीं है, और उसे फिर से बांटने का मतलब, फिर से ग़रीबी बांटना ही होगा, लिहाज़ा, फोकस संपत्ति बढ़ाने पर होना चाहिए. लगभग 75 साल बाद, जब भारत का संपन्न वर्ग दुनिया के टॉप – 10 अरबपतियों के बीच अपनी राह बना चुका है तो भी भारत वही पुरानी लकीर पीट रहा है.

अगर हम वर्ष 1936 से, जब मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने औद्योगिक नीति का प्रस्ताव रखा था, तबसे लेकर वर्ष 2020 – 2021 के आर्थिक सर्वे तक, भारत की औद्योगिक यात्रा पर निगाह डालें तो हम देखते हैं कि ये तमाम चीज़ें संपत्ति के असमान वितरण की ओर संकेत करती हैं.

इस यात्रा का दूसरा हिस्सा ग़रीबी को कम करने पर रहा लेकिन इससे गांव से शहरों की ओर जबरन पलायन देखने को मिला और ये लोग शहर में आकर महज उपभोक्ता के तौर पर बदल गए.

आर्थिक सुधारों की वकालत करने वाले कुछ लोगों का मानना है कि प्रतिस्पर्धा में कमी की वजह से भारत ने अतीत में तकलीफ़ें भुगतीं. लगभग वर्ष 1990 के दशक से पहले हर चीज़ राज्य के नियंत्रण में थी. वे इस बात की आलोचना भी करते हैं कि भारत समाजवादी मॉडल की वजह से एक हाशिये की ताक़त ही बना रहा.

उनका यह कहना महत्वपूर्ण है कि नेहरू और इंदिरा गांधी की नीतियों ने देश की वृद्धि को बाधित किया. और पीवी नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह की नीतियों की बदौलत भारत उन जंजीरो को तोड़ पाया और आज जो संपदा हम देख रहे हैं वे इन दोनों के उठाए क़दमों की बदौलत हैं.

ये सच है कि पीवी नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह की जोड़ी सुधारों को गति देने वाले इंजिन की तरह रहीं. लेकिन हमें इससे आगे जाकर प्रक्रिया को देखना चाहिए. सुधारों की ओर उनके उन्मुख होने के पीछे भी एक ऐतिहासिक रूप से क्रमिक विकास था, वो एक प्रक्रिया थी, महज़ कोई छलांग नहीं थी.

वो उस दौर के उद्योगपति थे जो कहते थे कि प्रतिस्पर्धा की ज़रूरत नहीं है. भारत के उद्योगपतियों ने ही पहली बार प्रतिस्पर्धा का विरोध किया था और सरकार से घरेलू उद्योगों को बचाने की गुहार लगाई थी. शुरुआती चरण में उद्योगपतियों ने गुज़ारिश की थी कि सरकार का नियमन, नियंत्रण होना चाहिए, और विदेशी उद्योगों से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए.

ये सिर्फ़ नेहरू का ख्याली पुलाव नहीं था. जब हम आज़ादी के मुहाने पर थे, तब जेआरडी टाटा की अगुवाई में उद्योगपतियों की 09 सदस्यों की टीम ने वर्ष 1944 – 1945 के दौरान बॉम्बे प्लान तैयार किया था. ये प्लान हमें बताता है कि उस दौर के उद्योगपतियों की सोच क्या थी.

प्रतिस्पर्धा के मामले में उद्योगपतियों ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि विदेशी प्रतिस्पर्धा में टिके रह पाने की भारत की क्षमता नहीं और नियमन और नियंत्रण बने रहने चाहिए.

वे न सिर्फ़ विदेशी निवेशों के ख़िलाफ़ थे, बल्कि सरकार से मदद मांग रहे थे. बॉम्बे समूह ने यहां तक कह दिया था कि घरेलू देसी उद्योग में जान फूंकन के लिए राज्य को पैसा लगाना चाहिए.

लेकिन लायसेंसिंग और नियंत्रण से जुड़ी नीतियां एकाधिकार की ओर ले गईं. एकाधिकार जांच समिति ने खुद इस बात की तस्दीक की थी.

एकाधिकार की वजह से ही क्षमता का विकास नहीं हो सकता था और लोगों को रोज़मर्रा के उपभोक्ता सामान के लिए कतारों में खड़ा रहना पड़ता था. चाहे वो संसाधन हों, या ज़रूरत के सामान हों, लैंडलाइन फोन हों या स्कूटर या कुछ भी, हर चीज़ किसी न किसी चीज़ के एकाधिकार की शिकार थी.

सरकार सबसे बड़ी पूंजीपति है और पूंजीवादियों की पोषक है.

सरकारी पैसों से भारतीय पूंजीपतियों की मदद, आज़ाद भारत के इतिहास में होता आया है. वर्ष 1955 – 1956 में संसद में नेहरू का भाषण इसी औद्योगिक नीति के इर्दगिर्द केंद्रित था.

रूस और चीन की तरह, यहां भी, इस्पात के उत्पादन पर ध्यान दिया गया था. पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि अगर देश को विकास करना है तो सार्वजनिक और निजी सेक्टरों को काम करना होगा और सरकार को इसमें मुख्य भूमिका निभानी होगी.

शुरुआत में ये ही महसूस कर लिया गया था कि पूंजी के विस्तार में राज्य की भूमिका बहुत अहम है और राज्य ही सबसे बड़ा पूंजीपति और पूंजीपतियों की पोषक है.

दूसरी पंचवर्षीय योजना में लिखा गया कि अगर निजी सेक्टर बड़े उद्योग स्थापित करने की लागत वहन नहीं कर सकता है तो राज्य को ये ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ेगी.

पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि को अहमियत दी गई थी, लेकिन दूसरी पंचवर्षीय योजना में उस जगह पर उद्योग ने क़ब्ज़ा कर लिया.

पहली पंचवर्षीय योजना ने खाद्यान्न के आयात की ज़रूरत से निपटने और सरप्लस की हद तक वृद्धि करने के लक्ष्य का ऐलान किया था. विश्व भर के अनुभव हमें बताते हैं कि सरप्लस की स्थिति नयी पूंजी और पूंजीपतियों का निर्माण करते हैं. भारत में भी यही हुआ.

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सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताएं भारत ने लगभग 80 के दशक में खाद्यान्न की कमी से निजात पा ली थी. आज वो खाद्यान्न का निर्यातक है. इस परिवर्तन में हरित क्रांति का अहम रोल था. उसके साथ, विभिन्न कृषि जातियों से पूंजीपतियों के नये वर्ग का उदय हुआ था.

आंध्र प्रदेश से कम्मा और रेड्डी जातियों का उदय इसकी एक मिसाल है. हरियाण और पंजाब के जाट और सिख व्यापारी बन गए. लिहाज़ा इस विकास ने कुछ जातियों में और ज़्यादा संपत्ति को फिर से वितरित कर दिया. सामाजिक असमानता यहीं पर उभरीं. शहर केंद्रित विकास मॉडल के चलते, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य औद्योगिकीकरण में पीछे रह गए. उसी दौरान तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्य आगे बढ़ निकले.

आज़ादी के समय, बिहार और पश्चिम बंगाल, बम्बई की तरह समान रूप से औद्योगिक थे. लेकिन आज वो पीछे रह गए हैं. ये वो बदलाव है कि जो आज आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी दिखता है.

दलील दी जाती है कि पश्चिम बंगाल के पास भले ही कोलकाता जैसा महानगर है, लेकिन भूमि सुधारों पर सख्ती से अमल करने और कृषि सरप्लस के निजी पूंजी के रूप में जमा नहीं होने से वो आज औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ है.

इसी दौरान, दूसरे पक्ष का कहना है कि पश्चिम बंगाल जैसी जगह में पूंजीवादियों को अपने क़दम पीछे करने पड़े जहां काम की अच्छी स्थितियां और बेहतर पगार जैसी मांगों के लिए जगह बन चुकी थी, और इसकी वजह थी अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता. पश्चिम बंगाल आज भी कई लोगों के लिए एक केस स्टडी है.

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अभाव से प्रचुरता तक लगभग वर्ष 1960 के दशक में, भारत में भोजन की कमी थी और अमेरिका के आयात पर निर्भर रहना पड़ता था. आज, स्थिति ये है कि खाद्यान्न इतना ज़्यादा है कि उसका क्या करें ये स्पष्ट नहीं है. हरित क्रांति और उसके बाद की प्रक्रियाओं की वजह से ये हालात बने थे.

मालूम था कि पूंजी, कृषि उपज की अधिकता से मिली है, फिर भी राज्य एक जरूरी शुरुआती चरण में उसके हित के लिए जरूरी पर्यावरण देने में नाकाम रहा.

कृषि में पैदावार के पिछड़े तरीक़ों की वजह से अधिक उत्पादन एक बड़ा अवरोध बन गया था. आज, पैदावार योग्य भूमि घट रही है लेकिन उत्पादन बढ़ रहा है. ये एक अहम बदलाव है.

लाल बहादुर शास्त्री ने हरित क्रांति की शुरुआत की थी और इंदिरा गांधी ने उसे जारी रखा. वो हरित क्रांति और उससे प्रेरित कृषि प्रौद्योगिक बदलावों ने उन बहुत सारे बदलावों की नींव रखी थी जिन्हें हम आज देख रहे हैं.

उस दौरान, नेहरू की दूरदर्शिता की बदौलत बनाए गए बांध, बड़े काम आए थे. आर्थिक प्रणाली वित्तीय अभाव से प्रचुरता की ओर उन्मुख हुई.

नये पूंजीपति परिदृश्य में उभर आए. ख़ासकर उन इलाकों और जातियों में जिन्हें हरित क्रांति से लाभ हुआ था.

ये संयोग नहीं है कि आंध्रप्रदेश में चाहे कोई भी सेक्टर हो – दवा, सिनेमा, मीडिया आदि – अधिकांश सेक्टरों पर उन लोगों का स्वामित्व है जो हरित क्रांति से लाभ हासिल करने वाले इलाकों से आते थे.

दुनिया भर में उदाहरण हैं जहां औद्योगिक पूंजी और उद्योगपति कृषि क्षेत्र से उभर कर आए हैं. लेकिन भारत को पूंजी के विस्तार में मददगार कृषि सरप्लस में वृद्धि के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा था. उसी दौरान, बैंकिंग की आम लोगों तक पहुंच होने से लोगों की जमा पूंजी बढ़ने लगी थी.

पूंजीपतियों को उदारतापूर्वक क़र्ज देने के लिए सरकार को टैक्स के ज़रिए भी मदद मिल रही थी. इस प्रक्रिया के दौरान, भारी कर्ज़ लेने और उसे न चुकाने की प्रवृत्ति भी शुरू हो गई थी.

चीन में वर्ष 1978 मे सुधार शुरू हो गए थे. उसी दौरान भारत में उन पर विचार होना ही शुरू हुआ था. इंदिरा गांधी दूसरी बार सत्ता में आई तो उसका आगाज़ हुआ. उनकी अचानक मृत्यु के बाद राजीव गांधी ने उसे आगे बढ़ाने की कोशिश की थी.

लेकिन उस दौरान के राजनीतिक बवंडरों की बदौलत उनकी कोशिशों और उम्मीदों के मुताबिक सफल नहीं रही थी. एक तरह से कहा जा सकता है कि भारत में आर्थिक सुधार 12 साल की देरी से शुरू हुए थे.

लगभग वर्ष 1991 में भुगतान संकट के दौरान सोने को गिरवी रखने के घटनाक्रम ने सुधारों को अवश्यंभावी बना दिया. तत्पश्चात पीवी नरसिम्हाराव, “अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष” (आईएमएफ़) की शर्तों पर सहमत हो गए और उन्होंने सुधारों की शुरुआत कर दी. मनमोहन सिंह जैसे क़ाबिल अर्थशास्त्री की अगुवाई में सुधारों ने रफ़्तार पकड़ ली.

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औद्योगिकीकरण के तीन चरण पीवी नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह की भूमिका को समझते हुए भी ये ध्यान रखना चाहिए कि इन सुधारों के पीछे एक ऐतिहासिक प्रक्रिया थी.

शुरुआत में औद्योगिक सेक्टर सरकार के नियंत्रण में था. अगले चरण में, ये पब्लिक – प्राइवेट भागीदारी थी. आख़िरी चरण में, यानी की मौजूदा अवस्था में, निजी सेक्टर प्रमुख भूमिका निभा रहा है.

ये तीनों चरण भारतीय औद्योगिक सेक्टर और आर्थिक वृद्धि की यात्रा में साफ़ तौर पर देखे जा सकते हैं. ये भी स्पष्ट होता है कि ये तीनों चरण क्रमवार रहे हैं और निजी पूंजीपतियों को तैयार कर, राज्य धीरे धीरे कई सेक्टरों से दूर हटता जा रहा है.

कुल मिलाकर, सुधारों से जो तरक्की हासिल हुई है और जो संपत्ति इस तरक्की से पैदा हुई है, उसे रेखांकित करते हुए ग़रीबी को कम करने में भी उनकी सराहना की जानी चाहिए. लेकिन उसी दौरान ये भी नहीं भूलना चाहिए कि असमानताएं बहुत ख़तरनाक तेजी के साथ बढ़ती जा रही हैं.

सरकार की रिपोर्ट ने खुद ये संकेत दिया है कि “ग़रीबी” “क्रांति और अपराध की जननी है” तो जाहिर तौर पर सरकार को ही, बढ़ती असमानताओं पर लगाम लगाने की हर मुमकिन कोशिश करनी होगी.

Project Tasks:

आज़ादी सैटेलाइट क्या है, जिससे जुड़ी हैं 750 लड़कियां…!!!

चित्र 3: आज़ादी सेटेलाइट के अलग – अलग हिस्सों को स्कूली छात्राओं के अलग – अलग समूहों ने बनाया है.

भारत की आज़ादी के 75 साल पूरे होने पर मोदी सरकार की ओर से देश भर में मनाए जा रहे अमृत – महोत्सव के तहत रविवार को इसरो “आज़ादीसैट” नाम की एक “सैटेलाइट” लॉन्च कर रहा है.

इस सैटेलाइट की ख़ास बात ये है कि इसे बनाने में देश भर के सरकारी स्कूलों की 750 छात्राओं ने सहयोग किया है.

इस सैटेलाइट को “स्पेस किड्ज़ इंडिया” नाम की एक कंपनी ने बनाया है और इसे इसरो के “स्मॉल सेटेलाइट लॉन्च व्हिकल” (एसएसएलवी) से लॉन्च किया जाएगा.

ये एसएसएलवी की पहली उड़ान भी होगी. ये सैटेलाइट सतीश धवन स्पेस सेंटर श्रीहरिकोटा से लॉन्च होगी और इस दौरान प्रोजेक्ट का हिस्सा रहीं चार सौ से अधिक छात्राएं भी वहां मौजूद रहेंगी.

लगभग 08 किलो की इस सैटेलाइट में 75 फेमो एक्सपेरिमेंट हैं और इसमें सेल्फ़ी कैमरा भी लगा है जो इसके अपने सोलर पैनल की तस्वीरें लेगा. इसमें लंबी दूरी के संचार उपकरण भी लगे हैं.

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चित्र 4: भारत के 75 सरकारी स्कूलों की 750 छात्राएं इस सेटेलाइट को बनाने के प्रोजेक्ट से जुड़ी थीं.

सपनों की उड़ान सैटेलाइट इंडिया की सीईओ श्रीमथि केसन ने बीबीसी से कहा, “आज़ादी सैट 750 लड़कियों की भावना है. ये उनके आगे बढ़ने का ख़्वाब है. देश के अलग – अलग हिस्सों के सरकारी स्कूलों से जुड़ी छात्राओं को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया. इसका मक़सद लड़कियों में विज्ञान से जुड़ी जागरूकता फैलाना है.” श्रीमथि केसन कहती हैं, “सीधे तौर पर इस प्रोजेक्ट से 750 लड़कियां जुड़ी हैं लेकिन इस प्रोजेक्ट के ज़रिए हमने लाखों बच्चों तक विज्ञान को पहुँचाया है. छोटे – छोटे ज़िलों और क़स्बों के स्कूलों को जोड़ा गया.” सैटेलाइट का पेलोड डिवेलप करने का प्रोजेक्ट क़रीब छह महीनों तक चला और इस दौरान प्रोजेक्ट से जुड़ी छात्राओं को ऑनलाइन क्लास दी गईं.

केसन कहती हैं, “आज़ादी सैट उड़ान भर रही है. लेकिन इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी और ख़ास बात ये है कि हम विज्ञान को उन स्कूलों और बच्चों तक लेकर गए जो कहीं ना कहीं बहुत पिछड़े हैं. इस प्रोजेक्ट का असली मक़सद लड़कियों में वैज्ञानिक सोच का विकास करना है.” इस प्रोजेक्ट से जुड़ी 750 में से कुल 462 लड़कियों को सैटेलाइट लॉन्च देखने के लिए श्रीहरिकोटा ले जाया जा रहा है.

केसन कहती हैं, “इसरो पहुँचना और अपने सैटेलाइट को लॉन्च होते हुए देखना छात्राओं के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. हम चाहते थे कि सभी छात्राओं को लाया जाए लेकिन लॉजिस्टिकल कारणों की वजह से वो संभव नहीं हो पाया.”

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केवल लड़कियाँ ही क्यों?

इस प्रोजेक्ट में लड़कियों को शामिल करने की वजह बताते हुए श्रीमथि केसन कहती हैं, “मैं एनसीसी से जुड़ी थी, बेस्ट कैडेट रही और सेना में सीधे भर्ती हुई. लेकिन मेरी सिर्फ़ 18 साल की उम्र में शादी हो गई थी. एक लड़की के सामने जो चुनौतियां होती हैं, मैं उनसे गुज़र चुकी हूँ. मेरा सपना था कि मैं लड़कियों में जागरूकता पैदा करूं और उन्हें बड़े सपने देखना सिखाऊं. अंतरिक्ष में अपने ख़्वाब को पहुँचाने से बड़ा और क्या ही होगा. इसलिए ही हमने इस प्रोजेक्ट में सिर्फ़ लड़कियों को चुना क्योंकि हम उन्हें बड़े सपने दिखाना चाहते थे.” केसन कहती हैं, “जब हम छात्राओं की ऑनलाइन क्लास ले रहे थे तब हम उन्हें सिर्फ़ विज्ञान नहीं सिखा रहे थे बल्कि ये आत्मविश्वास भी भर रहे थे कि वो कुछ भी कर सकती हैं और कहीं भी पहुँच सकती हैं. जो छात्राएं हमारे साथ जुड़ी हैं वो अब वैज्ञानिक बनने का सपना देख रही हैं.” “हमने बच्चियों के मन में विज्ञान और आत्मविश्वास का बीज डाल दिया है और हम ये विश्वास करते हैं कि एक पुल बन जाएगा जो उन्हें विकास और प्रगति से जोड़ेगा. लड़कियों के विकास के बिना देश के पूर्ण विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है.” भारत आज़ादी के लगभग 75 वर्ष मना रहा है लेकिन सामाजिक और आर्थिक तौर पर अभी भी देश की आधी आबादी के सामने बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.

लगभग वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में साक्षरता दर 74 प्रतिशत है लेकिन महिलाओं की साक्षरता दर अभी भी सिर्फ़ 64 प्रतिशत बनी हुई है.

भारत सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2013 में उच्च शिक्षा के मामलों में प्रति सौ पुरुषों की तुलना में 81 महिलाओं ने ही उच्च शिक्षा के लिए दाख़िला लिया है.

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चित्र 5: इसरो छात्राओं की बनाई इस सैटेलाइट को लांच करने जा रहा है.

वैज्ञानिक सोच पैदा करना मक़सद श्रीमथि केसन कहती हैं कि इस प्रोजेक्ट का मक़सद छात्राओं की सोच के दायरे को बढ़ाना और विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें मौके दिखाना भी है.

वो कहती हैं, “बहुत सी छात्राओं के मन में ये सोच भी नहीं थी कि वो वैज्ञानिक भी बन सकती हैं. वो इंजीनियर या डॉक्टर बनने का तो सोचती हैं लेकिन वैज्ञानिक बनना उनकी सोच से बाहर था. अब हमने उनके मन में विज्ञान का बीज डाल दिया है और वो वैज्ञानिक बनने का सपना देखने लगी हैं.” इस प्रोजेक्ट से देश के अलग – अलग हिस्सों के 75 सरकारी स्कूलों की छात्राओं को जोड़ा गया है.

अमृतसर के मॉल रोड स्थित सरकारी कन्या स्कूल की छात्राओं का एक दल भी लांच का हिस्सा बनने के लिए श्रीहरिकोटा पहुँचा हैं.

बीबीसी के सहयोगी पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन से बात करते हुए इस दल में शामिल छात्राओं ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की है.

छात्राओं के इस दल ने सेटेलाइट के लिए एक चिप बनाई है जो अंतरिक्ष में प्रयोग का हिस्सा होगी. इसमें कई सेंसर लगे हैं.

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इस दल में शामिल एलिज़ा कहती हैं, “हमें छह महीने लगे. हमने एक चिप बनाई है जो सेटेलाइट में इंस्टॉल की गई है. मन में बहुत कुछ चल रहा है. उत्साह बहुत है. एक नई जगह जा रहे हैं, जहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.” इनमें से कई छात्राओं के लिए ये पहला मौक़ा है, जब वो अपने शहर से बाहर निकल रही हैं.

ऐसी ही एक छात्रा ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा, “मैं पहली बार विमान में बैठ रही हूँ. मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं फ्लाइट में बैठूंगी, लेकिन सपने सच होते हैं.” वो कहती हैं, “इस प्रोजेक्ट ने मुझे सपने देखना सिखाया है. हो सकता है आगे चलकर मैं स्वयं वैज्ञानिक बन जाऊं.” श्रीमथि केसन इस प्रोजेक्ट के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी शुक्रिया अदा करती हैं.

वो कहती हैं, “प्रधानमंत्री जी का सबसे बड़ा सहयोग ये है कि उन्होंने इसके लॉन्च के लिए हाँ कह दिया. अब हमारा सपना है कि इस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहीं लड़कियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का मौक़ा मिले.” केसन कहती हैं, “प्रधानमंत्री ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा दिया है. हम तो बेटियों को अंतरिक्ष में ले जा रहे हैं. हमें विश्वास हैं कि ये बेटियां विज्ञान के ज़रिए देश की प्रगति यात्रा का हिस्सा होंगी.”

एलन मस्क अंतरिक्ष में हज़ारों सैटेलाइट क्यों भेज रहे हैं…???

भारत में लड़कियों को कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ता है और जीवन और समाज के कई क्षेत्रों में लड़कियाँ आज भी बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं.

केसन कहती हैं, “मैं ये मानती हूँ कि लड़कियों को अब भी पूरी आज़ादी हासिल नहीं है लेकिन लड़कियों ने बहुत कामयाबी भी हासिल की है और बहुत बड़े बदलाव आए हैं. हम आज लड़कियों का बनाया सेटेलाइट लांच कर पा रहे हैं ये अपने आप में बड़ी उपलब्धि है.” केसन कहती हैं, “हमें लोगों के दिमाग़ से वो तस्वीर हटानी है जिसमें भारत की बेटी को गंदे कपड़े पहने हुए सर पर पानी का मटका लेकर चलते हुए दिखाया जाता है. हम बेटियों के हाथ में सेटेलाइट दे रहे हैं और भारत की बेटी की यही तस्वीर दुनिया को दिखाना चाहते हैं.” दलित समस्याओं के समाधान के लिए सार्थक पहल की आवश्यकता

प्रस्तुतकर्ता: डॉ. हरीश कुमार गुप्ता…!!!

पिछले दिनों…!!! हरियाणा के हांसी के मिर्चपुर गांव के दलितों के अनेक घर गांव के दबंगो के जरिए जला देने के बाद दलित समस्या एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। एक सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर कब तक दलित उच्च वर्गों के जरिए उत्पीड़ित किए जाते रहेंगे। कब वे दूसरी जातियों की तरह आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहतर होंगे और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेंगे जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं। इसी के साथ शासन की लापरवाही कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या कारण है आजादी के 64 वर्षों के बाद भी दलितों पर उत्पीड़न जारी है। इसी के साथ दलितों की हितों को लेकर अनेक संगठन धरना – प्रदर्शन करके अपना विरोध दर्ज कराने में लगे हैं। देखा जाए तो दलितों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लागू की गईं योजनाओं के अपेक्षित परिणाम वैसे नहीं आ पा रहे हैं जैसे की आने चाहिए। जिस आक्रामकता के साथ दलित समस्याओं को उठाया जा रहा है उससे यह साफ हो गया कि अब दलितों के प्रति बरती जा रही उपेक्षा को ज्यादा दिन तक दलित समाज और संगठन बर्दास्त नहीं करेगा। इससे यह बात साफ हो गई है कि सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों की समीक्षा बिना किसी आग्रह या दुराग्रह के करने का वक्त आ गया/ चूका है। पहल आर्थिक आजादी की…!!!

दूसरी पहल की शुरुआत हम लोगों को ही अपना हाथ आगे बढ़ा कर सार्थक करनी है। हम तो तैयार हैं…!!!

आप लोग तैयार हैं…!!! क्या…???

आजकल…!!! भारत में सामाजिक जातिगत और आर्थिक विषमता इस कदर गहरी है कि ऐसे बहुत कम लोग हैं जो दलितों को सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहतर होते हुए खुश होते हों। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दलितों की बेहतरी के लिए जो योजनाएं लागू की जाती हैं, वे अधिकांशतः भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं। इसलिए सरकार द्वारा जरूरतमंदों के लिए जारी धन इतनी देर में और इतने कम तादाद में पहुंच पाता है कि उससे उनकी बेहतरी की आशा नहीं की जा सकती है। उदाहरण के तौर पर मनरेगा को ही ले लें। सरकार द्वारा गांव के बेरोजगारों को 100 दिन की रोजगार की गारंटी देने वाली इस योजना के लिए आवंटित धन अधिकांश जिलों में जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच पा रहा है और इस्तेमाल के पहले ही भ्रष्टाचार का शिकार हो जाता है। इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय समिति के सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है। इसी तरह दलितों के मैला ढोने के कार्य को समाप्त करने की तमाम घोषणाओं के बावजूद अभी भी बड़ी तदाद में शहरों और कस्बों की दलित महिलाएं इस अमानवीय – प्रथा से मजबूरीवश लगी हुई हैं। जबकि केंद्र और राज्य सरकारें इस कुप्रथा को जड़ से ही खत्म करने के दावे करतीं रहीं हैं। जाहिर है जब तक राज्य और केंद्र सरकार इनके रोजगार और आय के दूसरे साधनों की मुकम्मल व्यवस्था नहीं करते, इस घृणित – प्रथा से उन्हें छुटकारा दिला पाना मुश्किल का काम है। गांवों में दलित खेतीहर मजदूर के रूप में आज भी शोषण का शिकार हो रहा है। इसके अलावा लाखों की तादाद में बंधुआ मजदूर के रूप में दलित शोषित हो रहा है। जिन 75 लाख परिवारों के पास अपनी हकदारी का आवास न होने की बात सरकार मानती है उनमें से ज्यादातर दलित तबके के ही लोग हैं। गांवों में भूमि – सुधार की जो पहल आजादी के बाद की गई थी (विनोबा भावे ने एक सार्थक पहल आजादी के बाद भूमि – सुधार को लेकर बिहार और दूसरे कई राज्यों में की थी जिसके सार्थक परिणाम निकले थे) वह कारगर नहीं हो पाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि गांव का दलित आज भी तमाम कोशिशों के बावजूद खेती के काबिल जमीन से लगभग महरूम है। गांव – गांव में पानी के संकट से निजात दिलाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने चापाकल (हैंडपंप) लगवाने की जो योजनाएं लागू की उससे बहुत बड़ी तादाद में दलितों को लाभ तो हुआ है, लेकिन अभी भारत के हजारों दलित गांव ऐसे हैं, जहां न तो चापाकल (हैंडपंप) पहुंच पाया है और न ही बिजली के तार ही लग पाए हैं। इसके अलावा और भी तमाम समस्याएं हैं, जिससे गांव का दलित रोजाना रूबरू होता रहता है। यह सच है कि अभी भी दलित समाज भारतीय समाज के दूसरे तबकों से कई मायने में बहुत पीछे है, लेकिन यह भी सच है कि आजादी के बाद दलित समाज को जो सरकारी, संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अधिकार हासिल हुए वे हजारों वर्षों में पहली बार हासिल हुए। इसलिए दलित संगठनों को अपनी आक्रमकता के वक्त इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि दलित – सामाजिक – उत्थान और उनकी बेहतर स्थिति जो अब है, वह भारत के इतिहास में कभी भी नहीं थी। गांवों में जहां उन्हें कुएं का पानी भरना दूर, कुएं पर चढ़ने की भी मनाही थी, वहां पर अब वह निडर होकर (कुछ अपवादों को छोड़ दे) पानी भरता है। जहां पर वह शादी – ब्याह में शान – शौकत नहीं दिखा सकता था, अब वह अपनी मर्जी से खूब धूमधाम से विवाह संपन्न कराता है। दलित शासन और प्रशासन की उस ऊंचाई पर पहुंच गया है, जहां आजादी के पहले उसके पूर्वज कभी स्वप्न में भी शायद नहीं सोचे होंगे। आजादी के बाद से ही दलितों के किसी आयु – वर्ग के व्यक्ति के साथ भेदभाव करना एक बहुत बड़ा अपराध माना गया। इसे बाकयदे संविधान में शामिल किया गया। जो अधिकार दलितों के बच्चों और महिलाओं को आजादी के बाद हासिल हुए, वे उन्हें हर तरह से आगे बढ़ने की गारंटी और सुरक्षा दोनों देते हैं। इसी तरह दलित लड़कियों और लड़कों के शिक्षा और नौकरी के लिए शासन ने जो सुविधाएं दी हुईं है, यह उनके प्रति शासन की सहिष्णुता और उनके प्रति संवेदना नहीं तो क्या कहा जाएगा? मतलब ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां दलितों को विशेष दर्जा न हासिल हो। इसके बावजूद दलितों पर अत्याचार देश के हर हिस्से में लगातार होते रहते हैं। इस पर केंद्र और राज्य सरकारों को बढ़ी सिद्दत के साथ सोचना होगा। बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर ने दलितों की अत्यंत खराब स्थिति के कारण ही संविधान में इनके लिए जगह – जगह आरक्षण की व्यवस्था की थी। उसका फायदा इन्हें पिछले 64 वर्षों में शासन, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, रोटी, कपड़ा और मकान में लगातार मिलता आ रहा है। आज दलितों की बेहतर होने स्थिति के लिए डॉ. भीम राव अंबेडकर का दलित – समाज – श्रेणी उपक्रम चल रहा है। लेकिन अभी भी समाज में इन्हें वह बेहतर स्थिति हासिल करनी है जो बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर चाहते थे। लेकिन इन्हें हासिल करने के लिए आक्रमकता की जगह बुध्दि और विवके से आगे बढ़ना ज्यादा मुफीद होगा। बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर ने शिक्षित हो, आगे बढ़ो, और संषर्घ करो का जो नारा दिया था, उसमें आक्रमकता की कोई जगह नहीं है। बापू महात्मा गांधी जी ने भी हिंसा या आक्रमकता के जरिए धन, अधिकार और सम्मान हासिल करने के हमेशा खिलाफ थे। इसीलिए वे किसी भी समस्या का हल ढूढ़ने में हमेशा अहिंसा और सत्याग्रह का ही सहारा लेते थे। यह सही है कि आजादी के बाद अहिंसा और सत्याग्रह के जरिए शासन तक अपनी बात पहुंचाने की गुजाइश बहुत कम हो गई है, लेकिन यह भी सही है कि हिंसा या आक्रमकता किसी समस्या का संपूर्ण और अंतिम हल नहीं है। इसलिए दलितों के हक की लड़ाई लड़ते वक्त दलित पार्टियां और संगठन आक्रमक रुख अपनाने से पीछे नहीं हटते हैं। अच्छा यह हो कि दलित संगठनों को दलितों की समस्याओं, उनके साथ हो रहे अन्याय और शोषण की चर्चा करते वक्त संविधान और शासन द्वारा दी गई मदद और मिले अधिकारों की भी बात को स्वीकार करना चाहिए। इससे ही दलितों के प्रति जहां एक स्वस्थ नजरिया बनेगी वहीं पर समस्याओं को उठाने पर उसे शासन और प्रशासन के अलावा जन सहयोग भी पूरी तरह से सिद्दत के साथ मिल सकेगा। आज दलित वर्ग का व्यक्ति लोक सभा अध्यक्ष से लेकर गवर्नर तक जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुंच चुका है। यानी हर क्षेत्र में दलित समाज आगे कदम बढ़ा चुका है, बावजूद उनके साथ भेदभाव और अत्याचार अभी भी खत्म नहीं हुए हैं। समाज के इस सबसे निचले तबके अथवा दलित संगठनों के साथ जबतक पूरा सम्मान और सद्भावना हासिल नहीं होती तबतक, इनके साथ न्याय नहीं हो सकता।

Vision To be a global leader in providing high – quality training, consultation, and skill development solutions that EMPOWER’S WOMEN…!!! Individuals and organizations to achieve excellence and drive positive change…!!!

Mission To deliver customized, innovative, and results – oriented training and capacity – building programs that foster personal and organizational growth, enhance performance, and develop sustainable skills for the future like… WOMEN EMPOWERMENT MISSION AND VISION …!!!

References; Own Source and Resources; {Especially Designed for Marketing People/ Students/ Dealers/ Corporate Sectors Exclusively like Automobile Industries; Aviation Industries; Universities/ Colleges/ Institutes/ Esteemed Organizations in terms of Students Studying in the streams like (BBA/ BCA; MBA/ MCA) B. Sc./ M. Sc.; B.E./ B. Tech.; M.E./ M. Tech. in Civil and Mechanical Engineering ++ All branches of Engineering/ Applied Sciences/ Marketing etc.} ++ Department of Engineering Mathematics and Computing Recommended in the BoS Meeting of “Department of Engineering Mathematics & Computing” held on 04th December, 2024; Course Name: Sustainability and Environmental Science Course Code: 25241211; “हमारा सन्देश”…!!! “हरा भरा रहे हमारा”…!!! “भारत देश”…!!! “जय हिन्द”…!!! “जय भारत”…!!!

“HAMARA SANDESH”…!!! “HARA BHARA RAHE”…!!! “HAMARA BHARAT DESH”…!!! “JAI HIND …!!! JAI BHARAT”…!!!

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